फैसला
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मैंने
अपने घर की बड़ी खिड़की खोलने का
फैसला कर लिया है ---
बंद कमरों की घुटन में
घुटा हुआ तरुण मन भागकर
वृक्षों से छ्नती
सौंधी ताज़ी हवा को
पी जाने के लिए
व्याकुल हो उठा है |
श्वासों में भीतर की ओर घुमड़ती
अन्तर-वेदना
मानो पिघलकर बह जाना चाहती है --और
आरकेटी-कणों के पुट
चटख उठे हैं भीतर ही
सवाल ये है कि आज
इस क्षण ,अभी
क्यों महसूस हो रहा है ये सब ?
क्या केवल इसलिए कि मैंने
अपने घर की बड़ी खिड़की खोलने का
फैसला कर लिया है ??????
डॉ,प्रणव भारती
(19 95 )