रिसाव
कहते थे न तुम !
तुम्ही तुम हो मुझमे ,
न आया न आयेगा कोई कभी भी |
हूँ तेरे खतिर इस दुनिया जहाँ मे ,
नही कोई अपना , नही कोई सपना |
मिलना है तुझसे ये वादा लिए था|
मगर अब हुआ क्या ?
कि आने से पहले ,
बदल डाला खुद को बताने से पहले ,
है कितना सहेजा है , जो है होने वाला
जो पहले था हासिल निभाया गया न |
कहाँ होगा मैने कोई बात लेकिन ,
पकड़ी वही बात भाई तुझे जो ,
क्यों झूठ बोला ,नही खुद को तौला ,
सच्चाई तुझसे बताई गई न |
मरी तो नही थी मुझे मार डाला ,
एक सुख की खातिर मुझे ,
हार डाला |
दे रही हूँ दुआँ फिर भी टूटे हृदय से,
रहता है जिसमे अब भी शेर बनके,
है रक्त पीता मुझमे है जीता |
दाँतों से फाड़े , खुद ही जख्म सीता ,
फिर भी न भरता नासूर सा है ,
जीवन को जैसे मंजूर सा है |