कुछ नही बचा जीवन मे अशान्ति के सिवा ,
नही जानती क्या कमी है , कुछ पाने की इच्छा भी नही,
न जाने कैसा मलाल , जैसे पिंझरे मे कैद पंछी तड़प रहा हो कैद मे पीड़ित उड़ने की इच्छा भी नही , कई बार मरी हूँ भावों मे क्षणिक सही शान्ति का आभाष था, किन्तु आज जाने क्यों जीवन शोक किन्तु मृत्य का, मे आनन्द नही |