वेद वाणी 6-70-4
घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा।
उर्वी पृथ्वी होतृवूर्ये पुरोहिते ते इद्विप्रा ईळते सुम्नमिष्टये॥ऋग्वेद ६-७०-४॥
द्यावा एवं पृथ्वी दोनो जल से युक्त है, जल इनको सुशोभित कर रहा है। जल की वृद्धि करने मे यें दोनो समर्थ है। यें परहित के लिए है।
हम इनकी स्तुति करते है कि सब सुखी रहें।
Both the Dyaava and the Earth are full of water, water is beautifying them. Both of them are capable of increasing water. This is for the benefit. We pray to them that everyone stays happy.