दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं
हमने सुना था इस बस्ती में दिलवाले भी रहते हैं
एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं
बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं
जिनकी ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिनके लिये बदनाम हुये
आज वोही हमसे बेगाने बेगाने से रहते हैं
वो जो अभी इस राहगुज़र से चाक-गिरेबाँ गुज़रा था
उस आवारा दीवाने को 'जालिब' जालिब कहते हैं