या हो जंग या हो द्वंद
मन को चीर देता हूं।
सुलगती है सभी सांसे हीये में
पीर देता है।
नही मिलता है कुछ भी
जब तलक चलती लड़ाई है।
महज तस्वीर एक बनती वहा हर पल तबाही है।
कही किलकारियां है तो कही आवाज रोने की
खुली आंखे बताती है पड़ी है किसको सोने की।
बड़े बडबोलते लोगो ने भी मुंह साध रखा है।
है साथी हम तुम्हारे , डरो मत वादा ये पक्का है।
कोई बिछड़ा कोई छूटा कोई शिकार होता है।
कोई हर रोज अपने आप से तैयार होता है।
कही कोई है भूखा और कोई नोचता खाता।
कही कोई जरा सी सांस के खातिर तरसता है।
कोई मुझको बता तो दे की क्या है आज ये अपना
लड़ा जो था वतन खातिर भगत सिंह का वही सपना
न हो युद्ध ऐसा अब आओ हम कसम खाले।
मगन तुम भी मगन हम भी मगन हो सब वतन वाले।
आनंद त्रिपाठी
लेखक।