सोचाथा हर ख़्वाब उस से तू लाजवाब निकली ।
हर रास्ते की तू राहदार निकली ॥
वक्त का आलम हे या तेरी क़िस्मत ।
मेरी दिल-ए-सुकून निकली ॥
यूँही सँवरते रहे अकेलेपन में ।
वक्त-ए-महोब्बत सी निकली ॥
चूमना था अंबर वो उड़ान से ।
हर लहेरो की ज्वाला सी निकली ॥
बे परवाह थे हम उस अंदाज़ से ।
महेफ़िल -ए-प्यार में डूबा निकली ॥