बढ़ती उम्र का बालक
ढलती उम्र के लोग
छुपाते है अपनी बाते
क्युकी क्या कहेंगे लोग
सहमी सी बिटिया
टूटी हुई खटिया
यौवन के गंदे रोग
छुपाते है सारी बाते क्युकी क्या कहेंगे लोग
जरा सा शराबी मन की खराबी
किसी से करीबी,मन की गरीबी
चुपके से आना, बहाने बनाना
छोटी सी बातो में रचाते है ढोंग।
क्युकी क्या कहेंगे लोग।
पानी भी डर के पीना
कभी न खुल के जीना
मन को मार लेना
किसी से भी मतलब न लेना न देना।
पकड़ कर के कोना सुषक शुषक के रोना
मनाते है वो जिंदगी भर के सोग।
क्योंकि क्या कहेंगे लोग।
आनंद त्रिपाठी।