खालीपन
आजकाल कोइ पुछता नहीं
कि
आप क्या करते हो...
तो प्यार से जवाब देते
हम कमाल करते है।
हा!
ये भीतर का सन्नाटा
ये खालीपन
बहुत अखरता है
दिन निकलता है
रात ढलती है
बीच में शाम कहीं खो जाती हे
वो दोस्तो की महफिलें
वो कहकहो की गुंज
वो चाय के खाली बर्तन
सिगरेट के धुंओ की गंध
ऐशट्रे में पडी आधी सिगरेट के टुकडें
और
वो
मुंह चिढ़ाते गलास।
पलंग की बिखरी हुई चद्दर
कपडों की सिलवटें
बहुत कुछ बयां कर ज्ती है
आज दिनो नहीं महिनो हो गयें
ये सन्नाटे को चीरती टेलिफ़ोन की घंटी बजती रहती है।
और वो सूनकर भीतर से
आव़ाज उढती 'नहीं नहीं'
ये लंबी उम्र अब शापित सी
लगती है।
थके कदम कुछ रुकना चाहते है
उख़डी हुई सांसो को संभलने दे।
थोड़ा समय
थोडी सांसे उधार लेके
उनके आने का इंतजार
फलने तो दे।
पर नहीं
यहां तो है...
भीतर का खालीपन लिए
मिलों तक सदीओ से
फैला हुआ सन्नाटा...
काजल
किरण पियुष शाह