मुड़कर भी न मिला कोई मोड़ ,
छोड़ती हूँ वह , चल रही हूँ अब जैसे दिशा चलती है ,रात को ओढ़कर निशा चलती है | कोशिश है मनाने की हृदय को दुवाओं के लिए , हर एक के जीवन मे नया फूल खिलें | जी भर चुका है जीवन की हकीकत से, जीवन की चाह नही , बची साँसो को अब खर्चना निबाह यही ||
-Ruchi Dixit