वेद वाणी 6-49-10
भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रूद्रं दिवा वर्धया रूद्रमक्तौ।
बृहन्त मृष्यमजरं सुषुम्न मृधग्घुवेम कविनेषितासः ॥ ऋग्वेद ६-४९-१०॥
उत्तम -उत्तम स्तुतियों एवं गायन के द्वारा समस्त ब्राह्मांडो के एक मात्र रचियता जो काल व आयु चक्र से परे, दर्शनीय, सुखदाता परमात्मा का सदैव हम यशोगान करते है।
Through the best praise and singing, we always glorify the One Creator of all universes that is beyond the cycle of time and age, the visible, pleasing Lord.