कल -कल बहता पानी बन जा
प्रेम-प्रीत के गीत गुनगुना
सबकी राम कहानी बन जा --
कल -कल -----
क्षत -विक्षत तन की मर्यादा
तू हर मन की वाणी बन जा ---
कल कल-----
दिशा-दिशा में तम फैला है
रोशन कर जग दानी बन जा
कल-कल ---
गंध बाँट दे सबमें ऐसी
प्रचलित एक कहानी बन जा
कल-कल ----
बरसा प्यार जगत भर में तू
चूनर रंगकर धानी बन जा ---
कल-कल बहता पानी बन जा ----
शुभ-रात्रि मित्रों
सस्नेह
डॉ . प्रणव भारती