#चुम्बन
याद है मुझे
वह चुंबन तेरा
जिसके बाद मेरा
सब कुछ बदल गया था
जाने कैसे मुझसे "मैं"जुदा हो
...तुम बन गई थी
पर तुमने कुछ कविता गढ़े
मेरे होठों पर
कुछ कविता गढ़े
मेरे रेशमी बालों पर
और कुछ कविता गढ़े
मेरे नैन नक्श पर
फिर तुम निकल पड़े
एक नई कविता की तलाश में...
मैं आज भी तुम्हारी गढ़ी कविता में
सांसे ले रही हूं
हां अभी मैं जिंदा हूं
पर तुम एक नई कविता को
जीते जी मृतप्राय बनाने के प्रयोजन में
भटक रहे हो....
जैसे मुझे बना गये
ऐ पुरुष तुम इतने निर्दयी कैसे हो सकते हो ?
इल्जाम लगा नारी पर पत्थर बनने का...
अहिल्या के रूप में...
जो पत्थर बन कर भी
नारी बनने के लिए प्रतीक्षारत रही...
पर तुम पुरुष...पुरुष देह में ही
पत्थर रहे तुम्हें कोई कैसे तारे??
तारा तो पत्थर को जाता है...
जो पहले ही पत्थर हो उसे कैसे तारा जाए
तुम्हें ( पुरुष को )तारने के विधि ईश्वर के पास भी नहीं...!!!
सीमा मधुरिमा
लखनऊ