प्रेम
ये शब्द ही खुद मे परिपूर्ण है
जो सृष्टि का आधार है।
जिससे नदियो मे धार है
जिससे निर्मल संसार है।।
जो मानवता की ढाल है
जिससे सुन्दर संसार है।
जिससे गुजा सब राग
जो योगी का परमार्थ है।।
जिससे फैला ये रूप है
जो राधा- कृष्ण का मर्म है।
जो विस्तृत छवि विछिन्न है
जो मीरा का सुर- ताल है।।
जिसमे सिमटा संसार है
जो सृष्टि का उत्थान है।
जिससे गीता का ज्ञान है
ये प्रेम ही है जो सर्वज्ञ है।।
#ValentineDay