*एक बार स्वामी विवेकानंद जी ने अपने गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस जी से पूछा, *अच्छे लोग हमेशा दुख क्यों पाते हैं*? इस सवाल पर परमहंस जी कुछ समय तक मुस्कराते रहे, फिर कहा, *हीरा तराशे जाने पर ही चमकता है*! सोने को शुद्ध होने के लिए आग पर तपना पड़ता है! *अच्छे लोग दुख नहीं पाते, बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं! इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता है, बेकार नहीं*! परमहंस जी ने अपने छोटे से उत्तर में वस्तुत: जीवन के मर्म को उजागर कर दिया!
*अपने जीवन में यदि हम सुख पाना चाहते हैं तो हमें दुख का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए*! हम कभी भी सदैव के लिए सुखी नहीं रह सकते! *अनियंत्रित सुख से हमारी संघर्ष की क्षमता कमज़ोर होती है, और हम मानसिक रूप से निर्बल हो जाते हैं*! स्पष्ट है कि दुख समस्त सुखों के मूल में व्याप्त है! उसका आधर स्तम्भ है! इसलिए ज्ञानी पुरुषों की और से कहा गया है कि दुखों का सामना करने के लिए भी सदैव तैयार रहना चाहिए! "सुप्रभात जी"
।।जय सियाराम जी।।