बिखरी सी मुलाकातें
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ज़िंदगी बदगुमान हो जाए
सारा किस्सा तमाम हो जाए
चंद लोगों की भीड़ में गोया
चंद लम्हों में शाम हो जाए !
स्याह रातें हैं ,स्याह बातें हैं
कैसी बिखरी सी मुलाकातें हैं
भूल बैठे हैं सभी रिश्तों को
कैसे जीना आसान हो जाए ??
हमने बोया है,हमीं काटेंगे
हमने खोया है हमीं पा लेंगे
बेवफ़ाओं के इन ख़यालों में
क्यों न ज़िंदा तमाम हो जाएँ !!
डॉ .प्रणव भारती