ग़ज़ल
तपन, ठिठुरन, गलन सबको बदन पर हम सजाते हैं...
बड़ी मुश्किल से इस मिट्टी को हम सोना बनाते हैं!
कि कहकर चांद को मुजरिम वो अपने साथ ले आये...
वही जो मित्रता सूरत से सारा दिन निभाते हैं!
कई रातों से हमने जान को देखा नहीं छत पर ...
अमावस को बुला कर रोष वो हम पर जताते हैं!
न भूले से भुलाया जाएगा बोसा तेरा मेरा ...
सुनो जांना तुम्हें किस्से हमारे हम सुनाते हैं!
बहुत है मारने वाले उन्हें जो हैं जरा नाज़ुक ...
अनघ ही आतताई से सदा सब को बचाते हैं!
©Poetessnehasoni
From my Diary
#Nehasoni