हिंदी भाषा : (रचनाकार - प्रमिला कौशिक)
(विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर)
10.1.2022
हिंदी दिवस मना रहे हम आज।
भारत के माथे पर बिंदी साज।
जिस भाषा में करते हम सगरे काज।
हमें है हर दिन, इस भाषा पर नाज़।
माँ से सीखी जो, मातृभाषा कहलाई थी।
राज की बनी तो, राजभाषा कहलाई थी।
हमारे मन में तो, राष्ट्रभाषा बन आई थी।
देखा! कितने सुंदर रूप धार हिंदी आई थी।
मन आँगन की साँकल, खुलती निज भाषा से
द्वार देहरी लाँघें, भाव-पाँव कितनी आशा से। कर किलोल शब्द जो दौड़ें, खुले वातायन से।
मलय समीर से फिरते, हर मन के प्रांगण से।
आँख मिचौली सी खेले, हिंदी भाषा में मन।
परदेसी भाषा में जकड़ा, ज्यों पिंजरे में तन।
अपनी भाषा सैर कराती, मन से मन तक।
परदेसी भाषा के बंधन, में जाता मन थक।
इतरा लो कितने भी, तुम बहुभाषा ज्ञान पर।
गर्वित है मन, हिंदी की आन बान शान पर।
भाव संप्रेषण का माध्यम, हिंदी ही है अपना।
देश विदेश में गूँजे हिंदी, यही हमारा सपना।।
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