वक़्त कैसा भी हो गुज़ारना पड़ता है,
ग़लत हो अगर हम तो खुद को सूधारना पड़ता है,
जब हमारे बर्बाद होने की दुआएँ मांगी लोगों ने,
तो पता चला ये ज़माना हमसे कितनी हसद रखता है
यहाँ रिश्तों की क़दर कहाँ किसी को,
ज़माना तो पल पल में बदलता है
इससे पता चलता है कि कौन तुम्हारा है,
वरना अपना होने का दावा तो हर कोई करता है
हर वक़्त साथ निभाने वाले लोग चाहिए
सूरज के ढलने से तो साया भी ढलता है
हर एक चीज़ अपने ही वक़्त में होती है,
नहीं तो जीने के लिए कौन मरता है