*प्रकृति सचमुच बहुत विलक्षण है वह कभी भी अपने को कहीं भी दोहराती नहीं है* ! वह हमेशा नया रचती है और नया रचने की प्रक्रिया में लगातार अपने को बदलती रहती है और आगे बढ़ती रहती है ! *हम भी प्रकृति की ही उत्पत्ति हैं उसके ही विराट रूप का एक अंश हैं* !
हम अपने जीवन का बहुत सारा वक़्त और बहुत सारी उर्जा दूसरों के जैसा बनने में लगाते हैं ! *हमें लगता है कि दूसरे लोग हमसे श्रेष्ठ हैं और जीवन की दौड़ में वे हमसे आगे निकल जाएंगे , इसलिए उनकी देखादेखी हम उनके जैसा ही कार्य करने लग जाते हैं* ! क्या बेहतर नहीं होगा कि प्रकृति ने जैसा हमें रचा और गढ़ा है, हम निरंतर उसे ही बेहतर बनाने की कोशिश करें ! "सुप्रभात जी"
।।जय सियाराम जी।।