Date-02/12/2021,
हे कान्हा,
मैं आपको हर पल अपने आसपास
महसूस करती हूं।
मेरे सुख में तु समाया हुआ है,
मेरी खुशी में तु छाया हुआ है,
हे कान्हा,
मैं आपको हर पल अपने आसपास
महसूस करती हूं।
मेरे जीवन के उतार चढ़ाव में,
मेरे जीवन की धूप-छांव में,
हे कान्हा,
मैं आपको हर पल अपने आसपास
महसूस करती हूं
जब मुझ पर मुश्किल आईं हैं,
आपने हरबार मेरा साथ दिया हैं,
मुझे तेरी पनाह मिली हैं,
हे कान्हा,
मैं आपको हर पल अपने आसपास
महसूस करती हूं।
तुम कहां मंदिर में बसते हो?
कि हवेली में झूला झुलते हो?
तुम तो गरीब की रोटी में,
दु:खियों के दर्द में ,
मेरे ह्रदय में, सांसों की माला में,
मेरे रोम रोम में बसते हो।
हे कान्हा,
मैं आपको हर पल अपने आसपास
महसूस करती हूं।
स्वरचित- डॉ दमयंती भट्ट।