मुसाफिर,,,
मैं एक मुसाफिर हूं,
जीवन अस्तित्व कायम रखने
जीवन पथ पर चलते रहने
की कसमें वादे प्यार वफ़ा करते
करते आगे आगे बढ़ते रहने के लिए,
जीवन की डगर को थामें हुए,
मैं अपना काम करता हूं ।
अपनी डगर अपना पथ,
अपनी सोच,अपनी खोज,
अपना रास्ता खुद की मंज़िल,
को पाने के लिए बेताब हूं,
, मैं अपना काम करता हूं ।
ये हवाएं रूख़ बदलती है,
मौसम बदलते रहते हैं,
पतझड़ हो या बसंत बहार,
धरती अविचल रहतीं हैं,
मैं अपना काम करता हूं ।
सदियों से चलाता रहता है,
ये आवन-जावनका सिलसिला,
राम आएं क्रिष्ना चलें गएं,
ख़त्म ना हुआ ये सिलसिला,
मुसाफिर बदलते गएं,
सूरज-चंदा वहीं के वहीं रह गए,
मैं एक मुसाफिर हूं यारों,
बस मैं अपना काम करता हूं।
✍️...© drdhbhatt...