अपनो के सब राग भूलकर
कहा चले तुम हमे क्षोड़ कर
खेल वेल अनगिनत मेल।
लाठी डंडों की वो रेल।
ये सब भूल गए।
किन राहों का हुआ मुसाफिर।
क्यों हम सब शूल भए।
अगर चुभन थी तो कह देते
बिन बोले ही हम रह लेते।
शिकवे गिले बयां कर देते।
कहा चल दिए मुख को मोड़कर।
अपनो के सब राग। ........
एक नीच यौवन के पीछे सारे रिश्ते
तुमने भींचे।
साजन के बाहों के खातिर तुमने हमसे बाहें खींचे।
हम कातिल थे , या बेदिल थे,
हमसे कहते मत चुप रहते।
हम और तुम सब अंग संग रहते
बिना बताए बिना उठाए।
कहा खो गए दिल हिलोरकर।
जीवन के सब राग.......