ख़यालों के बदलने से भी होती हैं नयी सुबहें
फ़क़त सूरज निकलने से सवेरा तो नहीं होता
मैं देखूं ख़्वाब रौशन से, करूँ जब बन्द आंखों को
हमेशा बंद आंखों में अंधेरा तो नहीं होता
ज़रूरी है रज़ा उसकी, उतरना दिल में उसके है
मेरे बस चाह लेने से वो मेरा तो नहीं होता
ख़ता उसकी है बोलो क्या, सज़ा संगीन देते क्यों
दिलों को लूटता है जो, लुटेरा तो नहीं होता
कि' शब्दों की कलाकारी से भावों को रँगे "बादल"
जो कूची से रँगे वो ही चितेरा तो नहीं होता
© मनीष बादल