शिर्षक: कलयुग ( मुक्तक रूप में )
भले को भला मिले, बुरे को बुराई
जग की यह रीत, अब हो गई पराई
अब तो हर कोई, बुरा कर मुस्कराता
बदला जग, आँख मूँद कर ही चलता
कहते थे, कभी सदा सच बोला करो
अब कहते, झूठ बोलने से न डरा करो
अंहिसा की जमीं, अब बंजर हो रही
सब कुछ नष्ट होने की, तैयारी हो रही
नई क्रांति, नया ज्ञान, आदमी है महान
सब कुछ छीन लो, इस सूत्र में छिपा दान
चोर अब यहाँ कोई नहीं, सब साधु बन गए
राम नाम जपकर, हम भी तो वैरागी बन गए
बढ़ता अँहकार कह रहा, अब इंसान न रहो
दौलत ही देगी साथ, उसी के अब बन के रहो
बंधनो में न ढूढो प्यार, कभी कमजोर न रहो
कल तुम्हारा न हो, इस सोच में ही जिंदा रहो
क्या करेंगे, अब जीवन के दर्शन को जानकर
अर्थ की दुनिया में, सब जायज, यह ही स्वीकार
आज अच्छे, कल बुरे, ऐसे दिन ही होंगे साकार
अच्छा काम कोई नहीं, चलेगा स्वार्थमय व्यवहार
दावा न कर "कमल", कल सब कुछ बदल जायेगा
शायद सँसार चलेगा, पर इँसान, इँसान न रह पायेगा
यही है यथार्थ, कलयुग में सब कल का ही ही जायेगा
सामने रखी रोटी को, शायद ही कोई पहचान पायेगा
✍️ कमल भंसाली