शिर्षक : गमन
भ्रमित ज्ञान
करता अधूरा समाधान
होकर सदा अनजान
कौन अपना ?
कौन पराया ?
अंदर बाहर से
सदा भरमाया
पर सही
कभी न बताया
जीवमं पथ का
"मानव"
भूल गया
क्या अच्छा ?
क्या बुरा ?
हर मकसद करना
उसे था
जो पूरा
स्वयँ रह गया
आधा-अधूरा
हिंसा और प्यार
एक सिक्के के
विपरीत से दो विचार
मन के आँगन में
दोनों का
एक ही द्वार
युद्ध मे हार भी जाते
तब भी
हिंसा के
सब अस्त्र छोड़ जाते
कल्पना थी
कुछ नं होगा
जीवन का
पर
वक्त कब रुका
गरुर झुका
बुढापे ने किया
अंतिम आगह
धर्म की सरण में
जाता हुआ मन
करता चिंतन
तन से
अलग होकर
बिखर जाऊँगा
भस्म हो जायेगा
मेरे अस्तित्व का
हर कण
यही एक क्षण
बाकी में है
सिर्फ "गमन"
प्रकाश से अँधकार
या
अँधकार से प्रकाश
की ओर...
✍️ कमल भंसाली