व्यथा
सड़क किनारे गुजरते हुए
एक आहट हुई आकाश में
टिप टिप बरसने को बादल
तड़प उठे आकाश में
अंधेरे गलियों से गुजर रही तब
एक मासूम अपना छाता लिए
बिजली जब चमक उठी अचानक
सहम गयी वो अपनी बढ़ते कदमो के लिए
घर अभी उसका दूर है अपना
ये सोचकर तेज़ बढ़ने लगी
मौसम की रिमझिम तब अचानक होने लगी
भीगने से बचती हुई किनारे वो चलने लगी
लोगो की नजरो से दूर खुद को वो हटाने लगी
भीगते बदन को देखने उसके भीड़ भी रुकने लगी
मौसम को कोसती मन मे सहमती वो आगे बढ़ने लगी
रास्ते का हर इंसान उसे घूरने लगा
मौसम का मिजाज भी अब बदलने लगा
खोल अपने छाते को वो बारिश से बचाने लगी
पर घूरती नजरो से वो खुद का छिपा सकी
पल पल बढ़ता कदम उसे और भी डरा रहा
बारिश से ज्यादा डर उसे इंसानो से अब लग रहा
कैसी ये मजबूरी है
नारी को बस लाचारी है
मनमोहक बारिश में भी
उसे बस घर जाने की जल्दी है
खुद को महसूस ना कर सकी
पहुँच घर ही उसने राहत की सांस ली
कैसी बारिश थी ये जो लोगो के
मन को ना धो सकी
बरसते बादलों को देख अब
वो खिड़की से मौसम को यूँ कोसती रही ।
written by IG @ajain_words