अपेक्षा
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फिर से इस बार
तुम्हे पुकरूँगी मैं ,
कहूंगी साथ आने को,
फिर से तुम देखोगे
मुझे वैसे ही निरीह निग़ाहों से,
तुम्हारी आँखों मे आंसू आ जायेंगे,
जो तुम्हारी बेवशी पर फुट फुट कर रोएंगे।
तुम्हारे लब जो हज़ारों कहानियां,
बयां करते हैं तसबुर में मेरे,
फिर से इस बार,
वो कुछ नही बोल पाएंगे,
अपनी असमर्थता और कायरता पर,
तुम ज़ोर ज़ोर से चीखोगे,
मैं सुनूँगी लेकिन
तुम्हारे फड़फड़ाते सूखे होंठो पर
बिना रंग चढ़े ,
किस्सा खत्म हो जाएगा,
हमारी कलह ए दास्ताँ का,
यूँ ही हर बार की तरह।
फिर से महसूस होगा ,
तुम्हे वो अनछुआ
स्पर्श हमारे प्रेम का,
सुदबुध खोये ,
प्रेम में सराबोर
हर स्मृतियों से भेंट होंगी
लेकिन तुम स्तब्ध खड़े रहोगे ,
जब तक कि मैं चली न जाऊँ।
फिर शुरू होगा लम्बा इतिहास
पूर्वजों धर्म इतिहास राजनीति
वेद पुराण का।
पर कोई बेहस, कोई दलील ,कोई तर्क,
और टीका टिप्पणी हुये बिना,
बात पूरी हो जाएगी,
हर बार की तरह।
संतोष,
विश्वास,
अपेक्षा
और आशा
साथ लिए मैं चली जाऊंगी
हर बार की तरह,
तुम्हें यूँही अकेला छोड़ कर।
सावन
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अबकी बार सावन में आना।
गीली घास पर बैठेंगे दोंनो साथ ।।
सुनेंगे कोयल की वो मीठी आवाज़ ।
जिसे सुनकर तुम रोमांचित हो उठते हो मुझे सुनने को।।
गीली हवा में मिट्टी की सुंगन्ध।
तुम्हें मेरे स्पर्श को याद दिलाती होगी।।
फूलों की खुशबू तुम कहाँ भूल पाते होंगे ।
जिससे सदा सुगन्धित रहते थे केश मेरे।।
गर्म चाय की पियाली वाले हाथों से ।
वो छू लेना मेरे रुख़सरों को ।।
तुम्हें बेचैन तो करता होगा मुझ से मिलने को।।।
अबकी बार सावन में आना ,
बैठेंगें दोनो साथ,
दरमियान सारे विद्वेष, सन्देह मिट जायें,
और हम फिर से हो जाएं एक।
सूखा पेड़
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सालों फल दिये उसने
अनगिनत लोगों को
कुछ अनजान राहगीर थे,
तो कुछ उसके अपने
जिन्होंने उसे बोया,सींचा
और पल्लवित पोषित किया।
उसके छायादार आश्रय में
न जाने कितनों ने विश्राम किया।
पक्षियों के कलरवों ने
न जाने कितने
नीड़ निर्माण किये।
गर्मी लू बरसात सर्दी में
न जाने कितनों का
वो सुरक्षा कवच बना।
आज सूखा, नीरस अकेले खड़ा है
अपने आस्तित्व को बचाये,
वही गर्मी लू बरसात सर्दी में।
अब फल लगते नही ,
फूल खिलते नही,
पक्षी नीड़ निर्माण करते नही,
कोई राहगीर अब यहाँ ठहरता नही,
भला ठूठा पेड़ भी कुछ दे सकता है
अब किसी को।
अब भी सामर्थ्य है उसमें
जो शेष बचा उसे देने का।
उसके अपने ले जाएंगे उसे
घर दरवाजे चौखट में
जड़वाएँगे उसे।
फिर भी शेष बचा अगर कुछ
तो उसका चूल्हे ईंधन बनाएंगे।