प्रवासी रात
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वो रात के अंधेरे में
सन्न रहता है अक्सर,
अभी दोस्ती नही,परिचय नही,अनजान है सब
रात के जुगनुओं, चमकते तारों और ठंडी सर्द हवाओँ से
अभी पहचान बाकी हैं।
हज़ारों मीलों बाद भी आसमान बिल्कुल नही बदला
बादलों से भरे आसमान को देखकर लगता है
सुबह तेज बारिश होगी
लेकिन लाख कोशिश करने पर भी
गेंदा का फूल नही दिखेगा,
नाचते मोर ,उड़ती तितलियां,वो मिट्टी की खुशबू
कितना मन मोह लेती थी मेरा सावन में।
ये सोचते ही उसकी नज़र
आसमान में तेज चमकते एक तारे पर गई,
कैसे पिता मुझे आसमान में सप्तऋषि तारे को दिखाते थे।
वो कोशिश करता है ,
समूह तारों को खोज लेने की,
लेकिन उसकी नज़र उस एक तारे से हटती ही नही।
जैसे वो उससे कह रहा हो ,
तुम अब जा नही सकते यहाँ से,
बिना मेरी अभिलाषा पूर्ण किये।
कभी उसकी महत्वाकांक्षा का शमन होते दिखता
तो कभी एक नया जोश
सब त्वरित पा लेने की
प्रबल इच्छा।
इन सबसे उसे डर लगता है
इनमें से किसी की भी आहट हो
तो वो तन कर बैठ जाता है बेड पर
और टुकुर टुकुर देखता है
फ्लैट की हर वो अव्यवस्थित चीज़ो को
जिसे कई सालों से वह
सुसज्जित करने की सोचता रहा है।
बन्द अंधेरे फ्लैट में चक्कर लगाते अक्कसर
उसे देखा जा सकता है।
कई चक्कर लगा कर वो
फिर से सोने की कोशिश करता है
अचानक देखता है कि मां उसके सिरयाने पर बैठी है
सारे दिन की बातें बताने को,
मां बहुत थकी हुई है और वो भी ,
लेकिन मां दिन का सारा हाल बताये बिना सोएगी नही
अब उसकी नींद खुल चुकी है।
उसका मन होता है बन्द दरवाज़ा और खिड़कियों को
खोल कर बाहर निकल जाए।
और घूम आये वो खेतों की छोटी छोटी पगडंडियों से होते
हुए तालाब, पोखर और जुगनुओं, चमकते तारे
सब उसका रात के अंधेरे में इंतज़ार करते होंगे।
उसे सोना है लेकिन अब आंखों से नींद
जा चुकी है।
वो बेड से नीचे उतर जाता है
बाहर नही जा सकता सब अपरिचित है अभी।
फिर से फ्लैट में गोल गोल चक्कर लगाना शुरू
और पानी पी कर,थोड़ी सांसे सयंमित कर कुछ खोजता है।
पैन और कोरा कागज़ ले कर कुछ लिखता है,
वो जो बोल नही सकता ,
वो जो कोई सुनने वाला नही,
वो जो कोई देखने वाला नही,
बस खुद से खुद को।
अब उसे सुकून है,
सारी बेचेनी कागज़ पर बिखेर कर,
ऐसे ही एक रात और कट गई उसकी।
####--प्रेमा--- ######