शिर्षक: भटकाव
कब तक भटकाये ?
जिंदगी को मंजिलों की तँग गलियों में
क्या फूल नहीं खिलेंगे
ख्बाबों की नन्ही सी कलियों में
दूर तक जायेंगे
तो क्या हासिल करेंगे ?
किन्ही गलत गलियों में फँस कर
उन्हीं में सिमट कर रह जाएंगे
सफर लंबा हुआ
तो तन्हां ही रह जाएंगे
दर्द के कई हिस्से टूट कर
चुभन के किस्से बन जाएंगे
सोच लेना, चाहतों की
अनजान गाँव में कुछ नहीं मिलता
खूबसूरती के जंगल मे
मायूस इँसान का कंकाल तक बिकता
एक शपथ की जरुरत लगती
जिंदगी जब मोहताज बनती
चार दिन चाँदनी, हर मंजिल
आगे अमावस्य की रात, बेरहम लगती
मोह के तमस में
शालीनता बेबस सी लगती
संयमी हो हम अगर
आत्मिक पहचान उभरती
धुँध का हटना जरुरी है
जीने का ढंग भी बदलना जरुरी है।
अब सोच के दर्पण में
मुस्कराते चेहरे का दिखना भी जरूरी है।।
✍️ कमल भंसाली