विभाग / प्रकार : पद्य / अछांदस रचना
शीर्षक : नारी एक रूप अनेक..
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आज के ईस नारी दिन पर दिलने कुछ बताया था l
मन मे रखे जज़्बातों को कलम से लिखवाया था ll
कितने रूप धरे नारीने क्यूँ ये न सोचा हमने कभी?
हरपल देती रही परीक्षा किसने नियम बनाया था ll
लो करता हूँ में बात पते की सूनी नहीं यहाँ कभी l
अपने यूंँ किरदार बदल के केसे सब अपनाया था ll
शुरुआत करू इस जीवन से तब तो मेने जाना l
माँ बनकर कोख मे अपनी नौ महीने समाया था ll
साँसे ली जब मेने तो पहचान जरूरी हुईं मेरी l
तब जाके नाम मेरा हक से बुआने दिलवाया था ll
जीवन यूंँ बढ़ा था आगे तब लगा मुझे अकेला हूँ l
बहन के रूप में आके पास मुझे गले लगाया था ll
जीवन मे कोई एसा हो जिससे शेयर करु में सब l
तब दोस्त बनके आकर मेरा सब सुलझाया था ll
जीवन के दो पहिए होते एसा कहते लोग यहाँ l
तब अर्धांगिनी बनके ही उसने हाथ बटाया था ll
दादी, नानी, चाची और कितने रिश्ते बाकी बचे l
दर्द समेट के सभी रूपों मे कर्तव्य निभाया था ll
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©धिरेनकुमार के सुथार "⛓️धीर⛓️"
"डी.के....." - बडौदा (गुजरात)