दुख भरी आँखों से भी वो मुस्कुरा देती है
गुलाबी हँसी के पीछे वो अपना दर्द छुपा लेती है
पढ़ ना ले कोई उसके ग़मों को
इसीलिये हमेशा रौनक़ चेहरे पर रखती है
अपने हाथों की लकीरों को देखकर अक्सर मुस्कुरा देती है
की कितने प्यारे थे वो हाथ
जब इन हाथों में था उसका हाथ
वक़्त ठहर सा जाता था
जब रहते थे दोनो साथ
नादां सी थी वो चुलबुली सी थी वो
पर फ़िर भी बहुत प्यारी उसके लिए थी वो
हँस कर सारी नादानियाँ वो उसकी भुला देता था
जब वो साथ था कैसा खुशनुमा समां था
खेलता था जब वो उसकी ज़ुल्फ़ों से
लगता था बस फिसली जाए उसकी उंगलियां उन्हीं ज़ुल्फ़ों मैं
आज जब देखती है वो उसका अक़्स
एक एक कर याद आ जाते हैं उसे उसके नक़्श
खो देती वो खुद को आज
अगर नही होता इस नई ज़िंदगी का आगाज़
बस अब उसे उसके वरिस के लिए ही तो है जीना
वरना तिल तिल कर हर रोज़ था उसका मरना
क्यों चला गया वो उसे छोड़कर
हर रोज़ करती है ख़ुदा से वो ये सवाल रो रो कर
आज़माइश थी ये सोच कर समझा लिया उसने अपने दिल को
नहीं तो कौन था उसे अपना कहने को
यादों में आज भी वो उसके साथ है
चाहे आज हाथों में नहीं उसका हाथ है