आनंद
आनन्द है
एक आध्यात्मिक पहेली।
दुख में भी हो सकती है
आनन्द की अनुभूति।
सुख में भी हो सकता है
आनन्द का अभाव।
इस पहेली को बूझने के लिये
देखने पड़ेंगे
जीवन के चित्र-
कठिनाइयों और परेशानियों से
घबराकर भागने वाला
जीवन को बना लेता है बोझ
डूबता-उतराता है
निराशा के सागर में,
समझता है संसार को
अवसादों का घनघोर घना जंगल।
जिसमें होता है साहस
जिसमें होती है कर्मठता
जिसमें होती है सकारात्मक सोच
और जिसमें होता है
संघर्ष का उत्साह
वह जूझता है परेशानियों से
हल करता है कठिनाइयों को
और ऐसा करते हुए
सफलता की हर सीढ़ी पर
अनुभव करता है वह
एक अलौकिक संतुष्टि
एक अलौकिक प्रसन्नता
स्वयं पर भरोसा
और एक अलौकिक सौन्दर्य युक्त संसार
यही आनन्द है।
धन, संपदा और वैभव
देते हैं केवल भौतिक सुख
आदमी
आनन्द की तलाश में
जीवन भर भागता रहता है
भौतिक सुखों के पीछे।
सुख भौतिक हैं
वे बाह्य है।
आनन्द आध्यात्मिक है
वह आन्तरिक है।
सुख की अनुभूति होती है
शरीर को
आनन्द की अनुभूति होती है
हृदय को
और हमारी आत्मा को।
आनन्द का उद्गम हैं
हमारे विचार,
हमारे सद्कर्म,
और हमारी कर्मठता।