मेरा देश महान
एक दिन देवर्षि नारद
यूं ही चहल कदमी करने
धरती पर उतर आए।
जहाँ वे उतरे
वहाँ थी चाय की दुकान।
बगल में मिल रहे थे पान।
चाय लेकर वे चुस्कियाँ भरकर पीने लगे
उसके स्वाद में एक नया जीवन जीने लगे।
सामने दीवाल पर लिखा था
काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है
वे सोचने लगे यह भरत भूमि आज भी कितनी नेक है।
वे चाय वाले से बोले क्यों भाई स्वर्ग चलोगे ?
बहुत दिनों से कोई नही गया
बहुत जगह खाली है
वह बोला मुझे नही जाना।
मेरी चाय के दाम चुकाओ
और अपने रास्ते पर जाओ।
नारद जी सकपकाये और
फिर बडबडाये ऐसा क्यों ?
वह बोला मेरा देश स्वर्ग से भी अच्छा है।
यहाँ हर स्कूल में देापहर का भोजन
मुफ्त पा रहा हर बच्चा है।
वर्ष में सौ दिन मिलता है रोजगार
फोकट में तनखा दे रही सरकार।
कारखाने में अगर नौकरी है पक्की
तो मालिक भी नही निकाल सकता
हमारी यूनियन है तगडी
हमारा कोई कुछ नही बिगाड सकता।
हमारे अधिकार है असीमित हमें कोई नही टोक सकता
काम करो या न करो वेतन कोई नही रोक सकता।
नेताजी की चम्मच बनकर दलाली करो और कमाओ।
मुर्गे फंसाओ, खुद खाओ और नेताजी को खिलाओ
और धन कुबेर बन जाओ
देश में बहुत अच्छे अच्छे कानून है नियम है
पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अपराधों को
कम कर सकें किसमें इतना दम है।
स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक है स्वतंत्रता से रहते है
जैसा हमारा मन करता है हम उस धारा में बहते है
कदम कदम पर है मधुशाला, चाहे खुद पियो
वरना हाजिर है साकी और बार बाला।
नारद जी अचकचाए, बोले ये लो चाय के दाम
मुझे आ रहे है चक्कर मैं तो चला अपने धाम।