हर शख्स ने पूछा मुझसे क्यो तुम्हे आराम न आया, ?
सुनता रहा बार-बार पर लबो पे तेरा नाम न आया.!
पुकारती रही बार-बार तेरे शहर की गलीया मुझे,
गुजरा उन गलीयो से कमबख्त बदनाम हो आया.!
मत पूछ की कितनी मुश्क़िल राह से गुज़रा हु मै,
तु यह सोच की तुझपर कोई आच तक न आया.!
तु क्या जाने कमबख्त गुजर चली यह जिंदगी,
मुंतज़िर-ए-शाम सर-ए-शाम तु कभी न आया.!
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