अर्थ
ईश्वर की रचित सृष्टि में
सर्वश्रेष्ठ कृति है मानव
मानव जिसमें क्षमता है
सृजन और विकास की
अविष्कार की और
समस्याओं के समाधान की
वस्तु विनिमय का समाधान था
मुद्रा का जन्म।
मुद्रा अर्थात अर्थ
अर्थ में छुपी हुई थी क्रय शक्ति
इसी क्रय शक्ति ने
बांट दिया मानव को
अमीर और गरीब में
अर्थ की धुरी पर घूमती हुई व्यवस्था ने
निर्मित कर दी
अमीर और गरीब के बीच
एक गहरी खाई।
अमीर हेाता जा रहा और अमीर
गरीब होता जा रहा और गरीब।
डगमगा रहा है सामाजिक संतुलन
असंतुलन से बढ रहा है असंतोष
असंतोष जिस दिन पार कर जाएगा अपनी सीमा
फैल जाएगी अराजकता जो करेगी विध्वंस
हमारे सृजन और विकास का।
यदि कायम रखना है अपनी प्रगति
जारी रखना है अपना सृजन
तो जगाना पडेगी सामाजिक चेतना
पाटना पडेगी अमीर और गरीब
के बीच की खाई
देना होगा सबको
आर्थिक विकास का लाभ।
पूरी करना होगी
सबकी भौतिक आवश्यकताएँ।
हर अमीर दे
किसी गरीब को सहारा
बनाए उसे स्वावलंबी
कम होगी बेकारी तो कम होगा
समाज का अपराधीकरण
और बढेगी राष्ट्रीय आय।
इस संकल्प की पूर्णता के लिये
सबको करना होगा प्रयत्न
तभी सच्चा होगा
सशक्त भारत के निर्माण का स्वप्न ।