ऐक और सुराही भर दे साकी , रब मे यार दिखा नहीं ।
ऐक ज़माना बिता फिर भी , मैं खुद से भरा नहीं ।
बहाने और भी हैं खुद को बहेकाने के लिए इस दस्तुर में ,
क्या करें पर , मैखाने का पता उसके दर से जुदा नहीं ।
शोर तो बहुत मचाया हमने अक्सर आयने के सामने ,
हमने खुद को अरसो तक गौर से कभी सुना हीं नहीं ।
ऊंगली राहगीरों को दिखाई हमने सनम के कुचे तक ,
मगर जहन ने वहां जाने का तकल्लुफ किया हीं नहीं ।
होश का क्या काम , क्यों खुद को ख्वाहिशो मैं कैद करे ,
आंख बंद करके , हमने धड़कन को कभी गीना हीं नहीं ।
मिले फिर भी ख़ुदा , तो हम ऊसका भी प्यार देख लेंगे ,
सुना है वोह अब तक किसी के लिए तड़पा हीं नहीं ।