छोटे-छोटे दुध मुँहे छौनों का एक झुंड ।
बढ़ा चला आ रहा है धीरे धीरे मेरी ओर ।
दिनकर की लपटों का शमन करते हुए
अरे इसने तो कैद कर लिया है तरणि को
रोक दी है उनकी गति ,विवश कर दिया है उसे ।
एक छोटी सी बच्ची उछलती जाती है उनके पास
और दौड़ पड़ती है आगे -आगे संभवतः बताने सबको
लौट रहे हैं वो जो पिछले साल छोड़ कर गये थे
स्वागत करो इनका ,इनके लौटने का ।