शीर्षक: जमाना
जमाने को क्या याद ? क्या नहीं याद है
न कोई, ये बात है, न कोई, फरियाद है
दस्तूर जमाना, कुछ कहकर ही निभाता
वैभव की गली में, सदा गरीब ही रहता
अपनी न सुनी कभी, कहता औरों के किस्से
उनमें से कुछ आते, तुम्हारे कुछ आते मेरे हिस्से
याद नहीं करता, कल कुछ कहा, कुछ हुआ
चापलूसी का शौकीन रहता, अनजान बना हुआ
चिंगारी आग कैसे बने, जमाना शातिर जादूगर है
आग लगाये, घी डाल बुझाये, तभी तो बाजीगर है
कहते, सुनो सब की, पर उसे और न फैलाओ
जमाने में तुम भी हो, चुप रह के सम्मान पाओ
✍️ कमल भंसाली