18 / 06 /2021
छेलछबीली लक्ष्मीबाई,
रानी झांसी लक्ष्मीबाई,
बुंदेलखंड से उठीं वो
तलवार पुरानी थी,
छेलछबीली लक्ष्मीबाई,
रानी झांसी लक्ष्मीबाई,
थी वो सिंहनी वीरांगना,
धधकती ज्वाला थी उनके
सीने में, देशभक्ति की,
अंग्रेज को भी वो खटकती थी,
छेलछबीली लक्ष्मीबाई,
रानी झांसी लक्ष्मीबाई ।
एक अकेली लड़ीं थी वो,
झूकी नहीं, न झूकने दिया
स्वाभिमान देश का,
अड्डी रहीं,डट्टी रहीं,
वो बड़ी मर्दानी थी,
आख़री सांस तक लड़ीं,
जबकि मातृभूमि की
वो बेटी मां को चूमकर
बोली, अपनी झांसी
किसी किंमत पर नहीं दूंगी,
कहकर, वीरगति को पा ली ,
छेलछबिली लक्ष्मीबाई,
रानी झांसी लक्ष्मीबाई ।
स्वरचित डॉ दमयंती भट्ट।