प्रभु राम की विवाह हेतु अयोध्या से वारात निकलते समय सभी प्रकार के सगुण होने लगे l तुलसी दास जी कहते है कि ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच कर कहने लगे- अब ब्रह्माजी ने हमको सच्चा कर दिया।
जिसका शरीर प्रभु के कार्य के लिए प्रयुक्त हुआ है भला वह धन्य क्यों नहीं होगा? हनुमान जी का अवतार भी तो प्रभु के कार्य संपादन के लिए हीं हुआ था l भरत जी भी लक्ष्मण जी के बारे में कहते है -
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥
अहा हा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं, जो श्री रामचंद्रजी के चरणारविन्द के प्रेमी हैं अर्थात् उनके चरणों की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ । मुझे तो प्रभु ने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसी से नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया l
अत : हम सब भी प्रभु के कार्य में लगे, प्रभु का चिंतन करते रहे तभी हमारा जीवन सफल होगा l
जय सियाराम, जय हनुमान l