Hindi Quote in Blog by Mona Laxkar

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part 4

तीन दिन केवल तीन दिन अमित ने उसके पिता को मान और आश्रय दे दिया होता तो वह हृदय से अमित को परमेश्वर का मान लेती।

वृद्धाश्रम के सन्चालक महोदय के साथ मिलकर उसने औपचारिकताएं पूर्ण की। 


वह बोल रहे थे,” इनके बहू , बेटा और दमाद भी है रिकॉर्ड के हिसाब से।उनको भी सूचना दे देते तो अच्छा रहता।


वह कुछ सम्भल चुकी थी बोली, नहीं इनका कोई नहीं है न बहू न बेटा और न दामाद।

बस एक बेटी है वह भी नाम के लिए ।”


सन्चालक महोदय अपनी ही धुन में बोल रहे थे,” परिवार वालों को सांत्वना और बाबूजी की आत्मा को शांति मिले।”


निशा सोच रही थी ‘ बाबूजी की आत्मा को शांति मिल ही गई होगी। जाने से पहले सबसे मोह भंग हो गया था। समझ गये होंगे *कोई किसी का नहीं होता,*


 फिर क्यों आत्मा अशान्त होगी।’


*” हां, परमात्मा मुझे  इतनी शक्ति दें कि किसी तरह वह बहन और पत्नी का रिश्ता निभा सकें | “*


ये पैसा ही है जो हर एक रिश्ते की रिश्तेदारी निभा रहा है।


 मैं भी एक स्त्री हूँ ,जो हर रिश्ते को निभा रही हूँ। *मगर एक बात कहना चाहती हूँ कि हर इंसान को अपने हाथ नहीं काट देने चाहिए ममता मे हो के ........*


*अपने भाविष्य के लिए कुछ न कुछ रख लेना चाहिए*       


  *........बाद में तो उनका ही हैं मगर जीते जी मरने से तो अच्छा है ....*

🙏

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