**अब तो पढ लो मुझे तुम**
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( मुक्तछंद काव्य रचना )
अब तो पढ लो मुझे तुम ,
देखो बढ़ रहे कितने जुल्मों ए सितम।
राह दिखाई है मैंने,तुम्हें जीने के लिए,
कारवां बनकर एकता दिखाओ तुम।
हर समस्याओं की दवां बनाई है मैंने,
सिर्फ उन किताबों को पढ़कर तो देखो तुम।
अत्याचार सहकर कभी खुशहाली नहीं आती,
हक के लिए लड़ना सीख लो तुम।
मुझे मिटाने वाले आज भी है परेशां,
ज्ञान का सुरज हुं मैं,मुझे मिटायेगा कौन?
पन्नों पन्नों पर लिखी है मेनै सारी वो दास्तां,
उसी दास्तां पर जरा गौर कर लो तुम।
मुझे ना देखो किसी जाति धर्म के चौखट में,
मैं तो चमकने वाला भविष्य हुं तुम सबका।
मुझे समझने कै लिए पढ लो तुम किताबें,
उन किताबों से चमकता सुरज हुं मैं तुम्हारें जीवन का।
स्वातंत्र्य,समता,बंधूता और एकता,
यही है तुम्हारें उन्नति का सही रास्ता।
ज्ञान का दीया जलाकर हर आंगन में तुम,
खत्म कर दो वो सारे जुल्म ए सितम।
चुप रहकर सहना अब तुम छोड़ दो,
कुछ मुट्ठीभर लोगों की तानाशाही तुम मिटा दो।
अंधेरे का ये बढ़ता साया खत्म कर देगा तुम्हें,
उसी अंधेरे के सायें को ही ज्ञान के रोशनी में जला दो तुम।
अब तो पढ लो मुझे तुम ,
मैं ही इस देश का भाग्यविधाता हुं।
डगमगा रही है अब लोकतंत्र की ये नैया,
कारवां बनकर उस तिरंगे को ही बचाओ तुम।
मिलिंद क.महा.लातूर.
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