**घुटन सी ये जिंदगी**
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( मुक्तछंद काव्य रचना )
घुटन सी ये जिंदगी मेरी अब,
मुरझायें फूलों जैसी हुई है ।
किसी के यादों में डुबकर हरपल,
मानों जैसी विरान सी हुई है ।
नेकी और सच्चाई मेरी अब तो,
पुरी तरह तन्हाई में डुब गई है ।
कैसे मैं किसीको बेवफा कहुं यहां,
मेरे तकदीर में कहां खिलना लिखा है।
ये कैसी है मेरे तकदीर की लकीरें,
जिस लकीरों में सिर्फ तड़पना ही लिखा है।
वफाई मेरी कर गयी मुझे अकेला,
उसी अकेलेपन को,कौन यहां जाना है?
मुरझायें फूलों से कभी बनती नहीं माला,
मुरझायें फूल बनते नहीं कभी सिंगार।
ऐॆसे ही तन्हाई मिली है मुझे सौगात में,
और सायें के साथ शुरू है ये मेरा सफ़र ।
घुटन सी ये जिंदगी मेरी अब ,
मुरझायें फूलों जैसी बनी हुई है।
जो तम्मना थी मन में हमसफ़र की,
वो मेरे ही बहते आंसुओं में खत्म हुई है।
मिलिंद क.महा.लातू
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