निर्शत प्रेम........
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रिश्तों की अबूझ पहेली
को समझ नहीं पाते हैं
असंतुष्ट मन को रिझाने
में भेद नहीं जान पाते हैं
व्यक्ति स्वयं को कभी भी
प्रायः समझ नहीं पाता है
अन्तर्द्वन्द भरी चेतना से
कभी उबर नहीं पाता है।
विद्रोही मन भटकने से
तो कभी नहीं चूकता है
अनजाने को पाने आतुर
से कभी नहीं रुकता है ।
मिथ्या स्वप्न संसार में ही
खुद ही विचरता रहता है
निर्शत प्रेम अभिलाषा में
स्वयं को ठगता रहता है।
एम.एल. नत्थानी