"देखा है"
मैने बिना कोई ममता के,
किसी मां को भी देखा है।
मैने बिना इंसानियत के भी,
किसी इंसान को देखा है।
मैने बिना बचपन के भी,
किसी बच्चे को देखा है।
मैने बिना प्रेम के भी,
किसी प्रेमी को देखा है।
मैने बिना किसी शब्द के भी,
किसी खत को पढ़ा हुआ देखा है।
मैने बिना किसी प्रसव के भी,
कोई जन्म होते हुए देखा है।
मैने बिना किसी ज़िन्दगी के भी,
किसी को जीते हुए देखा है।
मैने बिना किसी खुशी के भी,
किसी को हंसते हुए देखा है।
मैने बिना किसी आवाज़ के भी,
किसी को चीखते हुए देखा है।
मैने बिना किसी मौत के भी,
किसी को मरते हुए देखा है।
मैने बिना कुछ देखे हुए भी,
बहोत कुछ देखा है।
- दार्शनिक
(आचार्य जिज्ञासु चौहान)