~ग़ज़ल,,,,,
⚙वजूद-ए-हर्फ़-ए-दुआ कामयाब होता हुआ!
⚙हर एक गुंचा लगे है गुलाब होता हुआ!!
⚙तरक़्कियों के नए क़ुम क़ुमे हुए रोशन !
⚙जिधर से गुज़रा कोई इन्क़लाब होता हुआ !!
⚙ख्याल-ए-काकुल-ए-गेती में लग रहा है मुझे!
⚙हर एक मिसरा ग़ज़ल की किताब होता हुआ !
⚙नज़र मिली थी कभी उससे दफ़अतन मेरी!
⚙गुज़र गया वो मेरे दिल से ख्वाब होता हुआ!!
⚙सुकूत-ए-शब के लबों पर यही वज़ीफ़ा है!
⚙इधर से गुज़रे कोई माहताब होता हुआ!!
⚙जिसे शऊर-ए-तिलावत है उसने समझा है!
⚙सवाल उसकी नज़र में जवाब होता हुआ!!
⚙किसी को इश्क़ का मैं मशविरा नहीं देता!
⚙दिलोँ को देखा है अपने ख़राब होता हुआ!!
⚙ख़िरद में इतनी कहाँ थी सलाहियत 'सागर'
⚙जुनूँ ने देखा उसे बेनक़ाब होता हुआ!
सागर त्रिपाठी,,,,,