भूरी गहरी आँखे देखो पीछा करती है,
खामखाँ पलकों को गीला करती है।
खुली हो तो चुपके से बातें करती है,
बंध हो तो ख्वाबों को लीखा करती है।
अनदेखे से सारे कोई लम्हे पिरोती है,
फिर पलकों में भर के जीया करती है।
दूरी बनाकर भी नज़दीक कर लेती है,
बातें अंधेरों को रोशन कीया करती है।
ऐसे मिल के लिपट जाती है जिस्म से,
परछाईयों का रंग जैसे फीका करती है।
अर्चना🌺