चले जो थे हम सफर साथ मिलकर ,
न भूलेंगे कभी 'लम्हा' समझकर,
वक्त कभी न कभी इत्तेला जरूर करवाएगा हमे
अजनबी बनकर
लेकिन मंजूर नही हमे तुमसे मिलना अंजना बनकर,
तू जहाँ रहे जिस हालात में रहे,
इबादत करते है खुश रहे
खेर हमारा क्या था, जीना यू तो सिख ही लिया आखिर हमने
अब जब कभी भी याद करते है तुम्हे
पाते तो है
लेकिन
हमारा बिछड़ा हुआ प्यार समझकर।
तू एक ख्वाहिस थी हमारी और रहेगी हरपल बस ।
इतना नही था प्यार हमारा जो निभाया है हमने...
बिना सोच 'समजकर'