सुनो ना मां।
मां!ओ मेरी प्यारी मां,
मैं जानती हूं, तू करती है,
मुझसे बहुत प्यार,
पर कतरा जाती है तू सबके सामने हर बार।
बहुत हिम्मत जुटा के कर रही हूं,
आज अपने दिल की बात,
यकिन है मुझे तू समझेगी मुझे इस बार।
सच-सच कहना मां,
अगर मैं कक्षा में पहली की जगह दूसरी आ गई,
तो तेरी जिंदगी में, मेरा स्थान कम हो जाएगा क्या?
अगर मैं कभी सुर में ना गा पाई,
तो मैं तेरी सुरीली नहीं कहलाऊंगी क्या?
यदि ताल से ताल मिलाकर कभी थिरक ना पाई,
तो तेरी दिल की धड़कन की लय ना बन पाऊंगी क्या?
बहुत कोशिश करी रोटी गोल बनाने की,
पर मैं हार गई मां,
गोल रोटी ही बनेगी प्रमाण मेरी सफलता का क्या?
कढ़ाई-बुनाई, टांके कपड़ों पर सफाई से ना ले पाई,
तो मेरे चरित्र पर दाग़ लग जाएगा क्या?
यदि आज एक खेल प्रतियोगिता हार जाऊंगी,
तो जिंदगी की दौड़, कभी नहीं जीत पाऊंगी क्या?
गले में कुछ एक मेडल तमगे कम होंगे,
तो तेरी बांहों का प्यार भरा हार खो दूंगी क्या?
लोगों की नजरों में थोड़ी कम अच्छी दिखूंगी,
तो तेरी कम अपनी कहलाऊंगी क्या?
सीधी लकीर पर चलते-चलते थक चुकी हूं,
कुछ देर तेरी गोद में सिर रखकर सोना चाहती हूं।
अपनी प्रत्यक्षता का प्रमाण गैरों की नजरों में देख,
टूट चुकी हूं मैं,
टूट कर जमीन पर बिखर जाऊं,
उससे पहले अपने अपने आंचल में,
मुझे समेट लेना मां।।
©ruchimodikakkad